Join WhatsApp
prabhu
10 June 2026

एक पेड़ की खातिर 363 लोगों ने दी जान! अमृता देवी की कहानी

एक पेड़ की कीमत... 363 इंसानों की गर्दन!

क्या आप किसी ऐसी माँ के बारे में सोच सकते हैं, जो अपने सामने अपनी ही तीन मासूम बेटियों की गर्दन कटते हुए देख ले, सिर्फ इसलिए ताकि एक पेड़ को बचाया जा सके? सुनने में यह किसी खौफनाक फिल्म की कहानी लग सकती है, लेकिन आज से करीब 296 साल पहले, राजस्थान की तपती धरती पर यह खूनी मंजर सच में घटा था। यह कहानी है दुनिया की सबसे पहली पर्यावरण शहीद अमृता देवी बिश्नोई की, जिन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए मौत को हंसते-हंसते गले लगा लिया था।

यह बात है साल 1730 की। जोधपुर से करीब 24 किलोमीटर दूर एक छोटा और शांत गाँव था—खेजड़ली। इस गाँव में अमृता देवी अपने पति और तीन बेटियों के साथ रहती थीं। बिश्नोई समाज से ताल्लुक रखने के कारण उनके दिल में पेड़-पौधों और जानवरों के लिए अपने बच्चों जैसा प्यार था। लेकिन एक सुबह इस शांत गाँव की किस्मत हमेशा के लिए बदलने वाली थी।

जोधपुर के महाराजा अभय सिंह को अपने नए आलीशान महल को बनाने के लिए चूना पकाने के लिए भारी मात्रा में लकड़ी की जरूरत थी। महाराजा के आदेश पर उनके दीवान गिरधर दास भंडारी सैनिकों और चमचमाती कुल्हाड़ियों के साथ खेजड़ली गाँव पहुंचे। वहाँ 'खेजड़ी' के हरे-भरे पेड़ों को देखकर सैनिकों ने जैसे ही कुल्हाड़ी चलाने के लिए हाथ उठाया, अमृता देवी बिश्नोई उनके सामने ढाल बनकर खड़ी हो गईं।

उन्होंने सैनिकों से हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं, उन्हें समझाया कि पेड़ काटना हमारे धर्म और संस्कृति के खिलाफ है। लेकिन राजा के घमंडी सैनिकों ने साफ कह दिया कि अगर पेड़ बचाने हैं, तो इसके बदले तुम्हें भारी जुर्माना (रिश्वत) देना होगा। अमृता देवी एक गरीब परिवार से थीं, उनके पास देने के लिए धन नहीं था। तब उन्होंने कड़कती आवाज में एक ऐसी बात कही जो इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गई:

"सर सांटै रूंख रहै, तो भी सस्तो जाण।"

(यानी अगर एक सिर कटवाने से भी एक पेड़ बचता है, तो यह सौदा बहुत सस्ता है!)

इतना कहकर अमृता देवी ने एक पेड़ को अपनी दोनों बाहों में कसकर पकड़ लिया। क्रूर सैनिकों पर उनकी ममता और हिम्मत का कोई असर नहीं हुआ। एक जोरदार आवाज हुई... और कुल्हाड़ी के एक ही वार से अमृता देवी का सिर धड़ से अलग होकर जमीन पर गिर गया।

जमीन खून से लाल हो चुकी थी। अपनी माँ को इस हाल में देखकर उनकी तीन जवान बेटियां—आसू, रतनी और भागू—रोईं नहीं, बल्कि उनके अंदर की वीरता जाग उठी। माँ के नक्शेकदम पर चलते हुए, वे तीनों भी अलग-अलग पेड़ों से लिपट गईं। उन निर्दयी सैनिकों की कुल्हाड़ियां फिर चलीं और उन तीनों मासूमों के सिर भी धड़ से अलग कर दिए गए।

जब यह खौफनाक खबर आसपास के बिश्नोई गांवों में फैली, तो कोहराम मच गया। देखते ही देखते 84 गांवों के बिश्नोई लोग खेजड़ली में इकट्ठा हो गए। उन्होंने फैसला किया कि वे अपने पेड़ों को कटने नहीं देंगे, चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े। एक-एक करके लोग पेड़ों से लिपटते गए और राजा के सैनिक उनकी गर्दनें काटते चले गए। वृद्ध, महिलाएं, युवा और यहाँ तक कि छोटे बच्चों ने भी पेड़ों की खातिर अपनी गर्दन कटवा दी।

इस अहिंसक आंदोलन में कुल 363 मासूम लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब इस भयानक कत्लेआम की खबर खुद महाराजा अभय सिंह तक पहुंची, तो उनका दिल दहल गया। वे तुरंत खुद गाँव पहुंचे, इस नरसंहार के लिए माफी मांगी और उसी वक्त एक ताम्रपत्र (राजकीय आदेश) जारी किया। उन्होंने कानून बना दिया कि आज के बाद बिश्नोई समाज के किसी भी इलाके में कोई भी पेड़ नहीं काटा जाएगा और न ही किसी जानवर का शिकार किया जाएगा।

पूरी दुनिया में आज जो 'चिपको आंदोलन' (Chipko Movement) मशहूर है, उसकी असली प्रेरणा यही खेजड़ली की घटना थी। अमृता देवी बिश्नोई और उन 363 शहीदों का यह बलिदान हमें सिखाता है कि यह प्रकृति है तो ही हमारा अस्तित्व है। उनके इसी सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में भारत सरकार आज पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए 'अमृता देवी बिश्नोई राष्ट्रीय पुरस्कार' देती है।

Related Articles

Back to Blog